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24 फरवरी 2010: जब भारत के सुपरमैन ने 200 की दीवार तोड़ी

By Mumbai Indians

कहते हैं, मुंबई की क्रिकेट एक अलग संस्कृति पर टिकी है। वह ज़िद, वह अड़ियल जज़्बा, जो कभी बस इतना ही पर नहीं रुकता। करीब 13 साल तक दुनिया यही मानती रही कि वनडे क्रिकेट में 194 ही आखिरी सीमा है। लेकिन हमारे शहर की गलियों से निकले एक खिलाड़ी ने तय कर लिया कि अब यह छत भी तोड़नी होगी।

1997 में भारत के खिलाफ सईद अनवर ने 194 रन बनाकर मानक तय किया। अगले एक दशक तक ऐसा लगा जैसे क्रिकेट के देवताओं ने यहीं तक की इजाजत दी हो।

हमने कई दिग्गजों को उस दरवाजे तक पहुंचते देखा, पर अंदर जाते हुए नहीं। विव रिचर्ड्स, गैरी कर्स्टन और सनथ जयसूर्या जैसे नाम भी बस करीब आकर लौटे।

साल 2009 में जिम्बाब्वे के चार्ल्स कोवेंट्री ने भी 194 की मंजिल छुई, मगर उससे आगे नहीं जा सके। धीरे-धीरे लगने लगा कि शायद 50 ओवरों में दोहरा शतक इंसानों के लिए बना ही नहीं मानो यह किसी मैट्रिक्स का ग्लिच हो।

और फिर आया वो खास दिन: 24 फरवरी 2010

ग्वालियर के कैप्टन रूप सिंह स्टेडियम में, दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ और शानदार फॉर्म में चल रहे डेल स्टेन की अगुवाई वाले अटैक के सामने सचिन तेंदुलकर ने तय कर लिया कि “असंभव” उनके शब्दकोश में नहीं है।

36 साल की उम्र में, जब ज्यादातर खिलाड़ी विदाई भाषण की सोचने लगते हैं, तब मास्टर ब्लास्टर मैदान पर एक अलग फॉर्म में दिखाई दे रहे थे।

पहला 100 रन 90 गेंदों में था, लेकिन दूसरा 100? वह कुछ और ही था। सिर्फ 57 गेंदों में बनाया गया। जिसने वहां मौजूद सभी फैंस का दिल जीत लिया।

जैसे-जैसे सचिन 190 के पार बढ़े, पूरा स्टेडियम सांस रोके बैठा था। “होगा या नहीं?” का सवाल हवा में तैर रहा था। मानो एक भारी पत्थर उनके कंधों पर रख दिया गया हो।

और फिर वह पल आया चार्ल लैंगवेल्ड्ट की यॉर्कर को प्वाइंट की ओर सलीके से टिकाया गया शॉट, 147 गेंदों में 200*

टीवी पर रवि शास्त्री की आवाज गूंजी: “धरती पर 200 रन तक पहुंचने वाला पहला इंसान…”

उस पल दुनिया ने सिर्फ एक रिकॉर्ड टूटते नहीं देखा। उसने एक इंसान को एक लकीर तोड़ते देखा और यह रेखांकित होते देखा कि “असंभव” शब्द को नजरअंदाज करना या उसका अर्थ बदलना, यह अधिकार सिर्फ उसी का था।

आज भी उस दिन की याद रोंगटे खड़े कर देती है। है ना, पलटन?

वह “खड़ूस” DNA: सचिन से लेकर पूरी दुनिया तक

सचिन का 200* सिर्फ एक वर्ल्ड रिकॉर्ड नहीं था बल्कि वह एक ऐलान था। वही “24 फरवरी की आग” आज भी हर उस खिलाड़ी की रगों में बहती है जो ब्लू एंड गोल्ड जर्सी पहनता है। पलटन से पूछिए एमआई मेंटैलिटी क्या है. जवाब मिलेगा: जीतने की ज़िद ही नहीं, दबाव में भी हावी रहने की जिद।

हमने यह बार-बार देखा है। 2012 में रोहित शर्मा का इडेन गार्डेंस में खेला गया 109 या सूर्यकुमार यादव का गुजरात के खिलाफ 103*, जब उन्होंने मैच को मानो वीडियो गेम बना दिया।

यह सिर्फ स्ट्राइक रेट की कहानी नहीं है; यह उस चीज की कहानी है जो खेल को कॉलर से पकड़कर अपनी शर्तों पर मोड़ देती है।

सचिन के 200 के बाद भले ही नौ खिलाड़ियों ने उस दीवार को पार किया, लेकिन यह कोई संयोग नहीं कि एक शख्स ने मास्टर ब्लास्टर के ब्लूप्रिंट को उठाया और उसे 3️⃣ बार तोड़ डाला।

रोहित शर्मा ने एक मुंबई लीजेंड से मिला “नो लिमिट” मंत्र लिया और उसे अपने खेल के मैदान में बखूबी अमल में लाया।

24 फरवरी वह दिन है जब “असंभव” को आधिकारिक तौर पर रिटायर कर दिया गया। बस, एक बार ठान लिया तो कर ही दिया।